सर्व पितृ अमावस्या 2025: श्राद्ध मुहूर्त, तर्पण और पवित्र दान

हिंदू धर्म में सर्व पितृ अमावस्या का दिन अत्यंत पवित्र और विशेष महत्व रखता है। यह दिन उन पितरों को सम्मान देने के लिए समर्पित होता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध पितृपक्ष में नहीं हो पाया। 21 सितंबर 2025 को यह दिन आएगा और यह धार्मिक परंपरा, आध्यात्मिक ऊर्जा और पितृकर्म की पवित्रता से भरा हुआ होगा।

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पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए कर्म और श्राद्ध पितृगण को प्रसन्न करते हैं। उनकी आत्मा की शांति और आशीर्वाद से परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। इसलिए, इस दिन की महत्ता सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि पारिवारिक और मानसिक शांति के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। आइये जानते है सर्व पितृ अमावस्या 2025 के बारे में


🕰️ अमावस्या तिथि और समय

इस अमावस्या का आरंभ 21 सितंबर 2025 को रात 12:16 बजे होगा और समाप्ति 22 सितंबर 2025 को सुबह 1:23 बजे होगी। यह समय पितृकर्म, तर्पण और दान करने के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना जाता है। इस समय की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा अत्यंत गहन होती है।

इस अवधि में किए गए कर्म और पूजा विधियां अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती हैं। यदि आप इस दिन शुद्ध मन, शरीर और स्थान से पितृकर्म करते हैं, तो आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है और परिवार में सुख-शांति की स्थायी अनुभूति होती है।


🕉️ श्राद्ध मुहूर्त

सर्व पितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने के लिए तीन प्रमुख मुहूर्त होते हैं, जो पितृकर्म की सफलता और प्रभाव को बढ़ाते हैं:

  • कुतुप मुहूर्त (11:50 AM – 12:38 PM): यह समय अत्यंत शुभ माना जाता है। इस अवधि में तर्पण और श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनके आशीर्वाद से घर में सुख-समृद्धि आती है।
  • रौहिण मुहूर्त (12:38 PM – 1:27 PM): इस मुहूर्त में किए गए कर्म धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक फलदायक माने जाते हैं।
  • अपराह्न काल (1:27 PM – 3:53 PM): इस समय का उपयोग विशेष दान और पूजा के लिए किया जा सकता है।

इन मुहूर्तों के भीतर किया गया श्राद्ध और तर्पण कर्म पितृगण के आशीर्वाद को आकर्षित करता है और परिवार में मानसिक और आध्यात्मिक शांति लाता है।

📝 सर्व पितृ अमावस्या 2025: तिथि और श्राद्ध मुहूर्त तालिका

क्र.सं.कार्यक्रम / कर्मसमय (21-22 सितम्बर 2025)महत्व / विवरण
1अमावस्या आरंभ21 सितम्बर, रात 12:16 बजेपितृकर्म और तर्पण की शुरुआत के लिए शुभ समय
2कुतुप मुहूर्त11:50 AM – 12:38 PMतर्पण और श्राद्ध के लिए अत्यंत शुभ
3रौहिण मुहूर्त12:38 PM – 1:27 PMधार्मिक दृष्टि से फलदायक समय
4अपराह्न काल1:27 PM – 3:53 PMविशेष दान और पूजा के लिए उपयुक्त समय
5अमावस्या समाप्त22 सितम्बर, सुबह 1:23 बजेपितृकर्म और तर्पण समाप्त होने का समय

🧘 पूजा विधि

अमावस्या के दिन पूजा की विधि सरल किन्तु प्रभावशाली होती है। इसे विधिवत और शुद्ध रूप से करने पर पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

  1. किसी शुद्ध और साफ स्थान पर जमीन में रोली से स्वास्तिक बनाएं। यह प्रतीक सकारात्मक ऊर्जा, पवित्रता और आध्यात्मिक शक्ति का संकेत है।
  2. स्वास्तिक के चारों ओर जल, रोली और पुष्प रखें। जल का प्रवाह और पुष्पों की ताजगी पितृगण की आत्मा को प्रसन्न करती है।
  3. थोड़ी मिठाई और दक्षिणा चढ़ाएं। यह परंपरा श्रद्धा और आदर का प्रतीक है।
  4. किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और तिलक करें।
  5. अंत में ब्राह्मण को दक्षिणा देकर विदा करें।

इस पूजा विधि से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।


🎁 दान के उपाय

अमावस्या के दिन किए गए दान का विशेष महत्व है। यह न केवल धार्मिक दृष्टि से पुण्यकारी होता है बल्कि समाज और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। आप निम्नलिखित दान कर सकते हैं:

  • गाय का दान – समृद्धि और पवित्रता का प्रतीक
  • फल, वस्त्र, अन्न, सोना, भोजन, धन, अनाज या पानी का दान – पितृ प्रसन्न होते हैं और उनके आशीर्वाद से घर में सुख-शांति बनी रहती है

दान करने की यह परंपरा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति में उदारता, करुणा और आध्यात्मिक समझ को भी बढ़ाती है।


🌿 तर्पण विधि

तर्पण विधि पितृकर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।

  1. कुशा की जूड़ी और जल के लोटे के साथ पीपल के नीचे जाएं।
  2. कुशा की जूड़ी को पितृ मानकर जल से तर्पण करें। यह क्रिया पवित्र और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर होती है।
  3. तर्पण के बाद घर आकर भोजन के समय एक रोटी गाय को, एक रोटी कुत्ते को और एक रोटी कौओं को खिलाएं।
  4. छत या बालकनी में जल का पात्र और पक्षियों के लिए अनाज रखें।

इस विधि का पालन करने से पितृगण प्रसन्न होते हैं और आपके परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।


⚠️ नोट

इस आलेख में दी गई जानकारी पौराणिक शास्त्रों और ज्योतिष पर आधारित है। व्यक्तिगत मामलों और विशेष परिस्थितियों में किसी ज्ञानी पंडित या ज्योतिष विशेषज्ञ से सलाह लेना सर्वोत्तम रहेगा।


🔗 प्रमाणिक और ऑथेंटिक संदर्भ

  1. भागवत पुराण – पितृकर्म और अमावस्या का विवरण
  2. ब्रह्मवैवर्त पुराण – पितृपक्ष और तर्पण विधि
  3. भारतीय ज्योतिष शास्त्र – ग्रह स्थिति और मुहूर्त विज्ञान
  4. हिंदू धर्म ग्रंथ एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान – पितृकर्म पर विस्तृत अध्ययन

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